वीर भूमि है ये कुरुक्षेत्र
जली जो थी धर्मं की तीखी लाव से ,
एक खेल रक्त का चला था वीर बंधू का
मृत्यु की रणभूमि , जो इतिहास एक ये !!
वीर योध्दा अनेक जो पुरुषार्थ थे उसके ,
प्यासे रक्त के थे चलाके बाण से
नृत्य नग्न सा दिखाने वो चले
जहा भीस्म पितामह और अभिमन्यु ढले थे !!
भेद जब चला शरीर तीखे बाण से
तब ढका आसमा था कूट की एक चाल से ,
वहा बने थे वो सारथी विस्व-स्वरूप जो
क्षेत्र है वो खेल छल - कपट का जो !!
रुकी जो आंधी रुवंन और राख से
जला वो समसान था , बीर माँ की गर्भ चींख से
महाभारत था वो, और इतिहास आज भी है ,
जब भरा पाप था उन कुरुक्षेत्र में !!
यह कर्मभूमि है, चले है इन राह में
वीर तुम हो, मगज राह एक रणभूमि है,
निर्माण होते है कई कुरुक्षेत्र, योध्दा युगों में तब
जब धर्मं आड़ में होता है प्रज्वलित पाप तब !!
दिग्विजय थापा
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