Saturday, 25 February 2012

सम्बोधन !!




स्वप्न से भरी आज की चल्ती दौर से
उँचे आकाश की एक खोज् मे सदा
ले चल्ती हमे राहो की उन परछाईयौं मे
वो आत्मित्यता दिखाती कुछ राहे आज् भी
ईन सुनी राहो की कुछ पगडंअडीयौ मे !!


यात्री की तरह राह मे हम चले
कोइ पुकारे हमे दूर-दुर् से कभी
एक् सम्बन्ध ईन भिड की गहराइयौ मे
वो मिट्टी वो खुस्बु पुकारती हमे सदा
इस परदेश की अजब आवो हवाओ मे !!




महसुस है उन्की नम से भरी आँखो से
सुन्ते है वो आवाज अप्ने अन्तर्द्वन्द मे
आज पुकारती हमे इस लोह् से भरी जिन्दगी मे
वो आवाज् जो अप्नो की है , सिर्फ् अप्नो की
एक सम्बोधन करती मेरे लिये !!


  -  दिग्विजय थापा





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