आज एक दौर् फिर चला, नव- रेखाचित्र खिची,
इस अदभुत् समाज की अद्रिशीत कुट वाणियो मे,
पलपती हुई क्षण-क्षण, और छिपाती एक् राज पल- पल,
इस समाज के अंतर्द्वन्द की भीषण बौछार मे !!
मुशाफिर बन अब चला मानिस, छुपी ऊन चार दिवारीयो मे,
घिराते अप्ने अन्तर्मन् कि इर्श्या और द्वेश की लकिर को हरपल,
सोचू मैं तनिक् बैठ के पल्छिन कभी इन राज की गहराइयो मे,
ये कौन सा दौर् आया आज, कह्ते थे कबीर कलयुग तभि !!
देखु उस समाज को अप्ने दो चक्षु इर्दग्रिद गुमाकर,
एक् भरी अट्टहास ही अट्टहास गुँजती, देखति मुझे अन्तर्मन्,
इन् पल-पल बदल्ती हुई समाज के रश्मो -रिवाजो मे,
हर प्राणी एक् मेहमान है बन चला एक पल्छिन् के लिये अब !!
-दिग्विजय थापा

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