Saturday, 14 April 2012

माल-गाडी !!


धुँध के आगोस से गुजरती ये माल-गाडी  ,
अनेक दिशाये पकडे  हुये लोहे की पट्रियो  मे,
ऊतर की शीत हवाओ से  दौड लगाती हर-पल,
तो कभी दिशाये बदल्ती  ईन पट्रियाँ मे,
आज दौडती है  काले कोयलो  की राखो से ,
एक अद्रिश्य गन्तव्य बिसर्जन की   प्रतिक्षा मे !!

स्वप्न वाहक, वस्तु  शह-यात्री   सँग हरपल,
यात्रा प्रारम्भ करती हुई , नव् स्थल  तलाश मे ,
वो शितल्ता  से भरी एक् स्टेसन   छाव  को ,
हरपल-हरछड चिंगारिया भर्ती  कोयलो से,
चल्ती है सिटी बजाती हुइ , मधम-मधम्
प्रतिदिन एक खोज तलाश, उस उत्क्रिस्ट मन्डी डोर को,
अपने  दो-चार अन्मोल् वस्तु मोलभाव के लिये,
दौड लगाती, ये बेचारी बुढी माल-गाडी !!

दिग्विजय  थापा 






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