धुँध के आगोस से गुजरती ये माल-गाडी ,
अनेक दिशाये पकडे हुये लोहे की पट्रियो मे,
ऊतर की शीत हवाओ से दौड लगाती हर-पल,
तो कभी दिशाये बदल्ती ईन पट्रियाँ मे,
आज दौडती है काले कोयलो की राखो से ,
एक अद्रिश्य गन्तव्य बिसर्जन की प्रतिक्षा मे !!
स्वप्न वाहक, वस्तु शह-यात्री सँग हरपल,
यात्रा प्रारम्भ करती हुई , नव् स्थल तलाश मे ,
वो शितल्ता से भरी एक् स्टेसन छाव को ,
हरपल-हरछड चिंगारिया भर्ती कोयलो से,
चल्ती है सिटी बजाती हुइ , मधम-मधम्
प्रतिदिन एक खोज तलाश, उस उत्क्रिस्ट मन्डी डोर को,
अपने दो-चार अन्मोल् वस्तु मोलभाव के लिये,
दौड लगाती, ये बेचारी बुढी माल-गाडी !!
दिग्विजय थापा
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