एक् जहान है,
जहाँ सफेद बादलौँ का बसेरा है,
गगँचुम्बी इमारते न है जिस्मे,
न ही कोई इन्सानो का बसेरा है !!
फिर भी दूध सरह सफेद, वो जहान है,
जहाँ तारे बिखर्ते है अफ्नी उस्माओ से,
एक संसार जो अथाह है, और अन्भीग्य,
जहाँ सिमाओँ कि पाबँदियाँ अन्त होती है,
फिर भी वो परे है निचे बसे इन्सानो कि लकिरो से,
आज जहाँ इर्ष्या, द्वेष और अनात्मियता का समँदर है !!
आज चकित मैं यह देख सोच रहा
कौन बस्ता है उस सँसार मे,
है वो भाग्यशाली कौन्?
एक अर्थ जो अपूर्ण है,
आज भी मेरी इन चन्द पँक्तियो मे !!
है क्या वहां कोई स्वर्ग? या है कोई एक और सृस्टि का जन्म ?
आज एक मानिस मैं खोज रहा वो अदभूत सँसार हुँ,
ऊन सुन्दर्, सफेद् बाद्लोँ की गर्भ मे,
जहाँ कुछ और ही रौशनी बिखर्ति है अंबर में
छोड़कर इन बंधी हुई सी दिवारो से,
कभी ना अन्त होने के लिये !!
--दिग्विजय थापा

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