दूर उस रूखे से पेड़ पर फिर से कोपले फुट आई है
ऐसा लगता है जैसे नया मौसम आ गया है
जैसे नया बसन्त आ गया है !!
आकाश से गिरती हुई कुछ बुँदे
जैसे उसको नया पैगाम सुना रही हो
जैसे एक कसीस हो बंजर कि नील से !!
हौले हौले वो सुन रहा है उन आवाज़ को
वो हवाओ को जो उसकी और आ रही है
एक ऋतू ले कर . इक बहार ले कर !!
हां !! वो धीरे धीरे सांस ले रहा है
अपनी बंजर पे पड़ी जड़ो से
हां !! आज उस रूखे से पेड़ पर फिर से कोपले फुट आई है !!
दिग्विजय थापा
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