वक़्त के दायरों से गुजरते हुए
आज ये पंख कुछ बंधे से है !!
हां !! ये हाथ कुछ बंधे से है !!
दिल में बसे कुछ परिंदे है
उनके कुछ मीठे सपने है
जो देखते है उस निल को
जो अथाह है और स्वतंत्र है !!
उन्ही तंगी सी चारदीवारियों से
वो सोये से नादान परिंदे
आज निकल देखना चाहते है
उन सुन्दर बादलो को
जो एक बौछार करती है
जमीं पे दबी अंकुरों को निकालने
गुनगुनाना चाहती है उन
पुरानी किताब के शब्दों को
एक नया नज्म बनकर !!
हां !! अपनी आरजू के उड़ानों को छूने
वो देखना चाहते है उस निल के छोर को
जो उनके सपनो से बना है
जहाँ एक ऐसा घर है
जो स्वर्ग से भी सुन्दर है
जहाँ उनके ये सोये पंख
फैलते है फ़िज़ा में !!
एक रोशनी बनकर !!
एक सुन्दर बसंत बनकर !!
स्वतंत्र और निर्भय !!
जो उनके इन दबे हाथो को खोल दे !!
हां !! उसी स्वर्ग के आगोश में
पनप रही है उनके ऊँची तृष्णा
मझबूत बन रहे है उनके ये सपने
एक छोटे से घरोंदे में !!
- दिग्विजय थापा
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