Saturday, 11 February 2012

मिटटी के बर्तन !!

Until the clay reaches the potter's wheel, it remains called a muddy soil. It's the thought of the potter which makes that clay  for a final sale - Digvijay Thapa


 मैं तो एक कुम्हार हु
 मुरझाये इन  हाथो से
मिटटी में मूरत गड़ता हु
सोचा आज फिर कुछ बना लू
बहार कुछ धूप तेज हो चली है
कुछ मिटटी, कुछ पानी की  खुराक  से
आज कुछ ऐसा तो  बना लू
जिसकी सूरत कुछ तटस्थ हो
कुछ नव मुख और दो नयन तो निकालू
जिसकी चमक से मेरे इन थके  हाथो को
और सोच में पड़े मन को , कुछ राहत मिले
पर कहा मैं इस दिवास्वप्न में फिर रहा हु
मेरे चक्र का मैं ही तो ज्ञाता हु
बना सकू कुछ अनमोल रत्न तो
बाजार मोलभाव से ऊपर बिकेंगे
फिर भी सृष्टि का तो सार ही अजब है
मिटटी के बर्तन तो टूटा करते ही है कई बार
 मैं तो एक कामदार हु
सोचा इन मुरझाये हाथो से कुछ बना तो लू
इस चक्र को कुछ ऐसा तो घुमाव
की चलती हुई तेज हवाओ से
फेके हुए पत्थरो की चोट को समा सकू
में तो एक निर्जन निर्माता हु
मेरी ये  घुमती चरखा  ही मेरा जीवन है
सोचा कुछ ऐसा बना लू
जो उधर पराल में रखी  हुई साधारण बर्तनों से
कुछ तो फरक हो
बस एक डर है अंतर्मन में कही
मिटटी से बने ये बर्तन
फिर कही फूट न जाये
आने वाली बारिसो के मौसमो  में !!


दिग्विजय थापा






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